March 21, 2011

दिलों में ताजा है धुंधली स्मृतियां और पदचिंह





दांडी सफरनामा

नवागाम से समरेन्द्र शर्मा


महात्मा गांधी के दांडी कूच के दूसरे दिन शाम को नवागाम से आंदोलन ने अपनी रफ्तार पकड़ी थी। इस गांव में ही आगे की रणनीति तय करने गांधीजी और सरदार पटेल के बीच अहम बैठक हुई थी। वह स्थान आज भी सुरक्षित है, जहां आंदोलन की अगुवाई कर रहे दोनों नेता मिले थे और गांधीजी रात बिताई थी। यहां दीवार पर लगी शिलालेख इस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी है। इस स्थान के समीप दांडी यात्रियों के लिए विश्राम गृह भी बनाया जा रहा है। इसके अलावा गांव में गांधीजी से जुड़ी धुंधली स्मृतियों और उनके पदचिंह लोगों के दिलों में आज भी ताजा है।

नमक कानून के खिलाफ गांधी की दांडी यात्रा के दूसरे दिन का पड़ाव बरेजा और नवागाम में था। उन्होंने दोपहर को बरेजा तथा रात में नवागाम में विश्राम किया था। बरेजा में उन्होंने विदेशी कपड़ों और वस्तुओं को त्यागने का आव्हन किया था। जबकि नवागाम में उन्होंने फिरंगियों के खिलाफ लड़ाई के लिए बल मांगा था। उनकी दोनों बातों का गांव में ऐसा असर हुआ कि गांव के बच्चे, बूढ़े, महिला,पुरूष सभी वर्ग के लोग आंदोलन से जुड़ गए।

असलाली से निकलकर जब हम बेराज और नवागाम पहुंचे, तो यहां भी लोगों ने दिल खोलकर हमारा स्वागत किया। नवागाम में शाम को साढ़े 6 बजते ही गांधीजी एक मैदान में रूककर प्रार्थना के लिए आसान लगा लिया था। आंदोलनकारी भी उनके साथ बैठ गए और वैष्णव तन जेणे कहिए गाया। इस स्थान पर आज स्कूल है। इस स्थान पर गांधी जी की 4 लाख रूपए की लागत से प्र तिमा लगाई गई है। जिसमें उन बातों का जिक्र किया गया है, जैसा यहां गांधीजी ने किया था।

प्रार्थना सभा से कुछ दूर प्राचीन हनुमान मंदिर के समीप धर्मशाला में गांधीजी ने अपना डेरा लगाया था। धर्मशाला का वह कक्ष जीर्ण-शीर्ण हालात में आज भी उनकी स्मृतियों को सहजे हुए है। एक कमरे में गांधीजी के दांडी के लिए रवाना होने के बाद लगाए गए पत्थर में सरदार पटेल से मुलाकात सहित अन्य महत्वपूर्ण बातों का गुजराती में लिखा ब्यौरा काफी खास मायने रखता है। दरअसल, इस आंदोलन की रूपरेखा सरदार पटेल ने बनाई थी। यात्रा शुरू होने से काफी पहले वे लोगों को एकजुट करने गांव-गांव घूम रहे थे और लंबे अंतराल के बाद दोनों नेता इस गांव में मिले थे। माना जाता है कि इस स्थान से आंदोलन ने पूरे देश में जोर पकड़ा था। यहां पर गांधी के सानिध्य का अनुभव करके स्कूली बच्चे दोपहर का भोजन करते हैं।

इस जगह को सहेजकर रखने के लिए यहां पर काफी काम किए जा रहे हैं। दांडी यात्रियों के रूकने के लिए यहां 50 लाख से अधिक की लागत से विश्राम गृह बनकर तैयार है। दो-मंजिला इस भवन में कार्यक्रम के लिए हाल भी बनाए गए हैं। एक-दो महीने के भीतर इसका लोकार्पण किए जाने की तैयारी है। इसके अलावा भवन के सामने गांधीजी की आदमकम प्रतिमा भी लगाने की तैयारी है।

इस गांव में अंग्रेजी सरकार की यातनाओं के निशान आज भी मौजूद हैं। इस आंदोलन में गांधी के साथ रहे देवशंकर दवे के पोते महेंद्र दवे बताते हैं कि उनके दादा को अंग्रेजों ने दांडी सत्याग्रह से पहले इतनी बुरी कदर पीटा थी कि उनकी कमर तक टूट गई थी। उन्होंने प्याज पर टैक्स लगाने के खिलाफ आवाज उठाई थी और गांव वालों ने प्याज बेचने से इंकार कर दिया था। किसानों ने अपनी फसल को एक स्थान पर इकट्ठा करके रख दिया था। जिसके बाद अंग्रेज सरकार के सैनिकों ने उन पर जमकर लठाईयां बरसाई थी और आंदोकारियों को जेल में डाल दिया था। अंग्रेजी हूकुमत के समय जेल आज भी जस का तस है। हालांकि फिलहाल यहां लोग रहते हैं। इस स्थान पर अंग्रेजों के समय बनाए गए शिव मंदिर में लोग मत्था टेकते हैं।

सेनानी स्व देवशंकर दवे के 80 वर्षीय पुत्र श्याम लाल दवे दांडी यात्रा को याद करते हुए रो पड़ते हैं। वे बताते हैं कि अंग्रेजो के जुल्मों को सहनते हुए सेनानियों ने देश को आजादी दिलाई। यहां के युवा भी गांधीजी और उनके साथियों के बलिदान को याद करके गर्व की अनुभूति करते हैं। युवाओं को कहना है कि उनकी कोशिश रहती है कि गांधीजी के बताए रास्तों पर चलकर देश का नाम दुनिया में रोशन करें।

चाय-पान की नहीं है दुकानें

दांडी यात्रा पर पड़ने वाले गांवों की खासियत है कि यहां व्यसन और सामाजिक बुराईयों के खिलाफ गांधीजी के संदेश का आज भी पालन किया जाता है। नवागाम से पहले बरेजा में गांधी ने कहा कि अगर आप लोग चाय पीते रहेंगे और विदेशी कपड़े पहनते रहेंगे, तो कभी देश में स्वराज की स्थापना नहीं हो सकती है। इसलिए इनका त्याग करना आवश्यक है। इसके बाद यहां के लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर चाय पीना छोड़ दिया था। नवागाम में इसका काफी हद तक पालन किया जा रहा है। 10 हजार की आबादी वाले इस गांव में एक भी चाय और पान की दुकान नहीं है। लोगों का कहना है कि गांधीजी ने चाय के बहिष्कार का आव्हान किया था, इसलिए उन्होंने तय किया है कि चाहे जो भी व्यापार कर लें, लेकिन चाय और पान का व्यवसाय नहीं करेंगे। इसी तरह यहां पर शराब के खिलाफ लोग में जागरूकता है। हालांकि पूरे प्रदेश में शराबबंदी लागू है, इसके बावजूद लोग नशे के खिलाफ लोगों को जागरूक करते रहते हैं।

March 19, 2011

देखो! गांधी टोपी और सूत की माला से बदलती तस्वीर



दांडी सफरनामा

असलाली से समरेन्द्र शर्मा

महात्मा गांधी की राह (दांडी यात्रा) पर चलने के लिए अगर आपके पास गांधी टोपी और सूत के माला है, तो समझ लीजिए आपकी आधा यात्रा तो अपने आप सहज हो जाएगी। जब हम गांधी टोपी और सूत की माला पहनकर दांडी के लिए निकले तो पता नहीं चला कि कब 13 मील का सफर तय करके असलाली पहुंच गए। टोपी और माला को देखकर लोग काफी उत्साह से आवभगत करते हैं। वे फिर यह नहीं देखते कि यात्री किस जात या धर्म का है। उनके लिए इतनी जानकारी मायने रखती है कि वह दांडी यात्री है। लोगों ने हमारे साथ यात्रा के लिए निकले अंग्रेज युवक ज्यस्पर का भी उतनी ही गर्मजोशी से स्वागत किया, जितना हमारा किया। लोग इस बात से भी काफी गदगद नजर आए कि एक फिरंगी भी गांधीजी के रास्ते पर चल पड़ा है। रास्ते पर मेरा और अंग्रेज युवक का उत्साह उस समय और दुगुना हो गया जब सुनने मिला देखो हिंदी-अंग्रेज साथ-साथ।

दांडी कूच के ऐतिहासिक तारीख के दिन हमने भी साबरमती आश्रम से सुबह सात बजे अपनी यात्रा शुरू की। हमारा पहला पड़ाव कोचरप आश्रम था। दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद गांधीजी ने यही डेरा डाला था। वे यहां लगभग दो सालों तक रहे। इलाके में छूआछूत की भावना और प्लेग की महामारी की वजह से गांधीजी को यह स्थान छोड़ना पड़ा। लोग बताते हैं कि इस आश्रम में एक हरिजन दंपत्ति को शरण देने से गांधीजी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उसके बाद उन्होंने साबरमती आश्रम को अपना डेरा बनाया। इस स्थान के चयन के पीछे गांधीजी ने दलील थी कि यहां से श्मसान और जेल दोनों नजदीक हैं और दोनों जगह जाने के लिए उन्हें लंबी यात्रा नहीं करनी पड़ेगी।

कोचरप आश्रम में थोड़ी देर विश्राम के बाद हम चंदोला तालाब और असलाली पहुंचे। चंदोला तालाब में गांधीजी ने दोपहर तथा असलाली में रात्रि विश्राम किया था।

पहले दिन की यात्रा के दौरान रास्ते में हमे तपती धूप और भारी भरकम ट्रैफिक के कारण तकलीफ हुई, लेकिन गांव के लोगों के उत्साह और प्रे म को देखकर थकान मानो गायब सा हो गया। यहां के लोग गांधी टोपी और माला देखकर खुद ब खुद समझ गए कि हम दांडी यात्रा के लिए निकले हैं। सभी लोगों ने भरपूर सहयोग किया। मेरे साथ चल रहे एक अंग्रेज युवक का भी लोगों ने दिल से स्वागत किया। किसी के मन यह भावना नजर नहीं आई कि गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ ही मोर्चा खोला था, ऐसे में उनका यहां काम हो सकता है। इसके पहले भी पिछले साल ब्रिटेन की उच्चायुक्त की पत्नी जिली बकिंघम ने दांडी यात्रा की थी। साफ है कि गांधीजी के विचारों और सिद्धांतों को अपनाने में फिरंगी भी काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

असलाली के अपने भाषण में गांधीजी ने कहा था कि केवल असहयोग के हथियार को अपनाओ। उन्होंने सरकारी टैक्स, नौकरियों और सामानों के बहिष्कार का आव्हान किया, तो सबसे पहले यही के मुखी रणझोण भाई ने अंग्रेजों की नौकरी से त्यागपत्र का एलान किया था। उनके इस्तीफे ने पूरे देश में खलबली मचा दी थी और लोगों ने फिरंगियों और उनकी वस्तुओं का खुलकर विरोध शुरू कर दिया।

दांडी यात्रा के समय इस गांव की आबादी केवल 17 सौ थी। अब इसकी जनसंख्या बढ़कर 6 हजार हो गई है। गांधीजी ने जिस धर्मशाला में रात बिताई थी, वहां अब पंचायत भवन और आरोग्यधाम बन गया। हमने भी इसी जगह को अपना ठिकाना बनाया। हमने जब गांव के सरपंच जनक भाई बीरा से संपर्क कि उन्होंने काफी उत्साह से अगुवानी की। यहां के एक प्रतिष्ठित गुजराती परिवार ने अपने घर भोजन करवाया। ऐसा लगा जैसे अपने ही घर में बैठकर भोजन कर रहे हैं।

ऐतिहासिक दांडी यात्रा के साक्षी असलाली गांव में काफी बदलाव हो गया है। गांव के बड़े-बुजर्गों के मुताबिक गांधीजी के प्रवास के दौरान गांव के आसपास जंगल हुआ करता था। गांधीजी ने पगड्डी के किनारे यहां सभा ली थी। अब गांव में झोपड़ियों के बजाए पक्के मकान और पगड्डी की जगह क्रांक्रीट के सड़क ने ले ली है। गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर अच्छी जागरूकता दिखाई पड़ी। घर तथा सड़कों पर कहीं भी बहुत ज्यादा गंदगी नजर नहीं आई।

गांव में भले ही काफी बदलाव हुए हैं लेकिन आज भी लोगों के मन में गांधीजी के विचारों के प्रति काफी सम्मान है। गांव के सयाने जरूर इस बात दुखी है कि गांधीजी के विचारों को आत्मसात करने और उनकी स्मृतियों को सहेजने की दिशा में वे कोई सार्थक प्रयास नहीं कर रहे हैं। गांधीजी ने हमे विदेशी वस्तुओं को त्यागने की शिक्षा दी थी, लेकिन आज हम उसी के गुलाम होते जा रहे हैं। असलाली गांव के सेवानिवृत शिक्षक नटवर भाई पटेल का कहना है कि बापू की बताई बातों को छोड़कर हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर भाग रहे हैं। टीवी, क्रिकेट और अंग्रेजी ने हमे एक बार फिर अपना गुलाम बना लिया है।

इस यात्रा में अंग्रेज युवक ज्यस्पर के साथ वक्त गुजारने का मौका मिला। बातचीत में प्राचीन इतिहास में उसकी खासी दिलचस्पी है। उसने अपनी पढ़ाई भी इसी विषय में की है। दो साल पहले जब गांधीजी के बारे में सुना और पढ़ा, तो वह उनसे काफी प्रभावित हुआ। उनके सिद्धांतों और विचारों को बेहतर ढ़ंग से जानने के लिए दांडी यात्रा पर आए हैं। उसका कहना है कि गांधीजी के अहिंसा और समानता के भाव बड़ा रहस्य है। इसके बलबूते पर उन्होंने पूरी दुनिया को नया सबक सिखाया है। गांधीजी के विचारों को जानने के बाद वे खुद में काफी बदलाव महसूस करते हैं। वे हर पहलूओं पर सकरात्मक ढ़ंग से सोचने लगे हैं। उनकी विचारधाराओं का ही नतीजा है कि उनके चरित्र की जटिलताएं खत्म हो रही है और वे पहले से ज्यादा सरल महसूस करते हैं

March 17, 2011

पता नहीं कब और कैसे भरभरा गई मुठ्ठी भर नमक





अहमदाबाद, 17 मार्च। चाहिए बस एक मुठ्ठी नमक और जाग गया पूरा आवाम। महात्मा गांधी ने जब 12 मार्च 1930 को फिरंगी हूकूमत के खिलाफ नमक कानून तोड़ने के लिए दांडी कूच किया था,तो पूरे देश को समझ में आ गया कि यह नमक की लड़ाई देश के स्वाभिमान और बुनियादी हक के लिए है। भले ही इस यात्रा में गांधीजी के साथ 78 लोग शामिल थे, लेकिन देश के बच्चे-बच्चे और विदेश से भी उन्हें भरपूर समर्थन मिल रहा था। मुठ्ठी भर नमक के बहाने गांधीजी ने लोगों को ऐसे पिरोया कि अंग्रेजों को आखिरकार मुल्क छोड़ना पड़ा। आजाद भारत के इन 63 सालों में मुठ्ठी की एकता कब और कैसे भरभरा गई, पता ही नहीं चला। हालात यह है कि गांधीजी के सिद्धांत और आदर्श केवल मुन्नाभाईयों की गांधीगीरि में देखने-सुनने मिलती है। इस बात का मलाल उन लोगों के चेहरों पर साफ नजर आता है, जो आज भी गांधीजी के बताए रास्तों पर चलना पसंद करते हैं।

यह बात हम सभी जानते हैं कि गांधीजी ने दांडी यात्रा केवल नमक कानून तोड़ने के लिए नहीं की थी, इसके पीछे उनका मकसद बिल्कुल साफ था कि वे देश में स्वराज और सुराज लाना चाहते हैं। दांडी मार्च के दौरान वे अपने भाषणों के जरिए लोगों को विदेशी कपड़ों को छोड़कर खादी पहनने और व्यसनों को त्यागने का आग्रह करते थे। उनकी दलील थी कि विदेशी सामानों और नमक के कारण देश का लाखों-करोड़ों रूपया बाहर जा रहा है। यात्रा के दौरान गांधीजी प्राय: सभी गांवों-कस्बों में रूककर इन्हीं बातों को समझाने की कोशिश करते थे, इसका नतीजा देश को आजादी के रूप मिला। लेकिन स्वराज स्थापना के इतनों बरसों बाद भी देश सुराज के लिए दूसरे गांधी का मुंह ताक रहा है।

दरअसल अहमदाबाद आने के बाद दो किस्सों ने मुझे ऐसा सोचने के लिए मजबूर किया। पहले वाक्ये में मुझे एक गांधी समर्थक ने बताया कि लगे रहो मुन्नाभाई फिल्म के रिलीज होने के बाद साबरमती आश्रम में बच्चों की भीड़ भी आती है। माता-पिता बच्चों का यहां तब घुमाना शुरू किया जब बच्चों ने फिल्म देखने आने की जिद की। मतलब साफ है कि आज गांधीजी सिर्फ विचारों और किताबों तक सीमित हैं। जबकि उनकी बताई बातें रोजाना के काम से जुड़ी हैं। लेकिन घरों में गांधीजी का जिक्र कुछ मौकों पर ही आता है।

दूसरा वाक्या उस समय हुआ जब मैं आश्रम में किताबें देख रहा था, उसी समय एक खादीधारी सयाने से दिख रहे व्यक्ति ने आश्रम के संचालक से सवाल किया कि गांधीजी तो चले गए, अब आगे क्या। उनकी बातों में व्यंग नजर आ रहा था। हालांकि मुझे बाद में बताया कि वे एक बड़े गांधीवादी विचारक माने जाते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि गांधीजी की विचारधारा और उनके पदचिंह अहमदाबाद में ही धुंधले हो रहे हैं। इस बात से वे लोग भी इत्तेफाक रखते हैं, जो अपने पूर्वजों और गांधीजी से मिली विरासत को सहेजे हुए हैं।

गांधीसेना के अध्यक्ष और चार बार के दांडी यात्री धीमंत भाई मानते हैं कि गांधीजी की विचारधारा और आदर्शों के प्रचार-प्रसार के लिए केंद्र सरकार को खास ध्यान देना चाहिए। उनके नाम पर लाखों-करोड़ों रूपए खर्च तो हो रहे हैं, लेकिन उसकी सार्थकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गांधीजी के बारे में नई पीढ़ी को कुछ भी नहीं मालूम है। वे कहते हैं कि सरकार के पास अभी समय है। इस दिशा में सोचना चाहिए और स्कूल की पढ़ाई की शुरूआत से गांधीजी पर विशेष पाठ्यक्रम होना चाहिए। गांधी का उपयोग आजकल दिखावे और प्रचार-प्रसार के लिए ज्यादा होने लगा है।

वे बताते हैं कि गांधीजी ने उनके परदादा को खादी के काम के लिेए बुलाया था। पिता के विरोध के बावजूद वे इन दिनों इमाम मंजिल में खादी का काम देखते हैं। ब्याज पर पैसे लेकर उन्होंने दो लूम खरीदा है। लेकिन पूरे शहर में सूत कातने के लिए कोई कारीगर नहीं है। गांवों से कारीगर बुलवाकर खादी बनाते हैं। उन्हें तसल्ली इस बात की है कि गांधीजी के बताए रास्तों पर चलने की कोशिश कर रहे हैं। धीमंत भाई साल 1998 से लेकर अब तक चार बार राजीव-सोनिया गांधी सहित कई हस्तियों के साथ दांडी मार्च कर चुके हैं। वे एक बार दक्षिण अफ्रीका में 241 मील की यात्रा कर चुके हैं।

धीमंत भाई के ही परिवार के ही हिम्मत भाई और जय सिंह भाई भी साथ-साथ कई बार यात्रा कर चुके हैं। जय सिंह भाई रिजर्व बैंक में नौकरी करते हुए रिटायर हुए हैं। वे बताते हैं कि गांधी स्कूल में पढ़ने के कारण शुरू से उनके विचारधारा से प्रभावित थे। आज भी घर के साथ-साथ सड़क की सफाई के लिए बड़ा सा झाड़ू लेकर निकल पड़ते हैं। संस्मरण सुनाते हुए वे कहते हैं कि रास्ते में गांव वाले काफी उत्साह से हर दांडी यात्री का स्वागत करते हैं। खाने-पीने की चीजों से लेकर रहने तक का ध्यान रखते हैं। अपनी यात्रा के दौरान उनकी कोशिश होती है कि लोगों और स्कूल के बच्चों को गांधी के बताए रास्तों पर चलने के लिए प्रेरित करें।

हिम्मत भाई बताते हैं कि उनकी दांडी यात्रा का मकसद है कि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों को गांधीजी के विचारों से जोड़ सकें। सरकारी नौकरी में रहते हुए उन्होंने अवकाश लेकर यात्राएं की। पहली बार यात्रा करने के बाद से वे लोग खादी के अलावा कोई दूसरा कपड़ा नहीं पहनते। सभी की इच्छा है कि समाज से व्यसन, छूआछूत और कन्या भ्रूण हत्या बंद हो,लेकिन वे इस बात से खासे दुखी भी है गांधीजी का उपयोग लोग राजनीति और नाम कमाने के लिए किया जा रहा है। उनके सिद्धांत गांधीगीरि में तब्दील हो गए हैं।

July 15, 2010

कौन शर्मसार और कौन कलंकित


पटक पटक कर मार डाला.... भाई-बहन का रिश्ता हुआ शर्मसार...ममता हुई कलंकित...इस तरह की सुर्खियां आजकल हर न्यूज चैनल की पहली हेडलाइन होती है। टीवी खोलते ही इस तरह की खबरें देखकर कई बार बुरी तरह से इरीटेशन होता है। मुझे लगता है कि ऐसा केवल मेरे साथ नहीं बल्कि कईयों को भी होता है। पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण इसकी वेल्यू को समझता हूं। कई बार ऐसे मौके आए जब इस तरह की खबरों को सनसनीखेज बनाने के लिए मीटिंग में माथापच्ची करनी पड़ती थी। दरअसल यह बात इसलिए भी करहा हूं कि मुझे अपने एक संपादक की बात याद आ गई। आत्महत्या की एक खबर पर वो सिर्फ इसलिए जोरदार भड़क गए थे कि मेरे सहयोगी रिपोर्टर ने हेजलाइन से लेकर खबर में भी दो-तीन जगह सल्फास खाकर युवक ने खुदकुशी की, लिख दी थी। पहले तो इतनी छोटी से भूल के लिए इतने जोरदार गुस्से के लिए हम लोगों ने उन्हें काफी कोसा था। उनका कहना था कि जहर खाकर आत्महत्या लिखना काफी है, क्यों हम लोगों को आत्महत्या वाली दवाइयां का नाम प्रचारित कर रहे हैं। अब उनकी बात को याद करके लगता है कि हम खबरों को सनसनीखेज बनाने के चक्कर में क्या क्या गलती करते हैं।

मेरा मानना है कि कोई व्यक्ति या समुदाय का कोई भी कदम विचारधारा की परिणिति होती है। विचारधारा समाज और होने वाली घटनाओं को महत्व देने से बनती है। हम अक्सर देखते हैं कि किसी हादसे या घटना के पक्ष-विपक्ष में होने वाली प्रतिक्रया को जनभावना के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन वास्तव में ये जनभावनाएं नहीं होती। इसमें कुछ ऐसी विचारधारा होती है, जो कहीं कहीं से बायस्ड होती है। जिसका प्ररिणाम हर उस व्यक्ति को भुगतना पड़ता है, जो इससे प्रभावित हुआ है। बार-बार इस तरह की घटनाओं के सुनने या देखने से यह भी लगता है कि लोगों ने इस ढ़ंग से अपनी तकलीफ या समस्या को कम करने की कोशिश की थी, भले ही वे सफल हुए या नहीं इससे उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपने देखा हुआ कि मीडिया में किसी घटना के जरूरत से ज्यादा प्रचारित होने पर आसपास या कहीं और उसकी पुनरावृत्ति होती है।
कुल मिलाकर मेरा कहना है कि टीआरपी के चक्कर में हम लोगों के मन मष्तिक को किस तरह दूषित कर रहे हैं। इसका भी ध्यान रखना चाहिए, केवल साप्ताहिक रैटिंग के लिए हम अपने दायित्वों और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को ध्यान रखे तो हम एक अच्छा वातावरण बना सकते हैं।

नेशनल चैनल में तो फिर भी स्थिति थोड़ी ठीक है, लेकिन रीजनल चैनलों ने पूरी सीमाएं ही लांघ दी। वहां बैठे वरिष्ठ संपादक और अनुभवी लोग यह भी भूल जाते हैं कि उनके चैनल को घर परिवार में छोटे से बड़े बुजुर्ग भी देखते हैं। टिकर और ब्रेकिंग खबरें तो ऐसी चलती हैं, जैसे अपराध नहीं हुए तो चैनल बंद हो जाएगा। मेरा यह भी नहीं कहना है कि चैनल को गुडी-गुडी होना चाहिए, लेकिन लोगों के पास ढेरों समस्याएं उनके निराकरण के लोगों को बेनकाब किया जा सकता है। समाज और राज्य में ज्यादा से ज्यादा अच्छाई लाने बुराईयों को खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए। न की गलत कामों को इस तरह पेश किया जाए कि लोग उसके तरफ आकर्षित हो। हम ऐसे लोगों को सामने लाने के लिए सिर्फ इसलिए परहेज करते हैं, क्योंकि वे लोग प्रभावशाली होते हैं। मेरा कहना है कि प्रभावशाली और दबंग लोगों की असलियत सामने लाकर टीआरपी में अच्छा काम किया जा सकता है।

May 31, 2010

आखिर यह कौन सा तंत्र है ?


अगर आप से तंत्र (शासन) के बारे में पूछा जाए, तो आपका जवाब लोकतंत्र या प्रजातंत्र जैसा कुछ होगा। अगर एक और तंत्र के बारे में बताऊं, तो चौंकने की जरूरत नहीं। क्योंकि यह कोई नई बात नहीं है। इससे हम सभी का पाला रोज या कभी न कभी जरूर पड़ता है। हालांकि इसका अस्तित्व देश की आजादी के साथ खत्म हो गया है। ( ऐसा माना जाता है) अगर आपको इसके नाम-गाम. महत्व या मतलब के बारे में कुछ समझ में आए, तो कृपया मुझे भी बताएं, ताकि मैं भी अपने आपको इससे परिचित करवा सकूं।
दरअसल पिछले दिनों राज्य सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के मौके पर एक बार फिर राजभवन जाना हुआ। हर बार की तरह इस बार भी राजभवन से काफी पहले पुलिस वालों ने गाड़ी रोक ली। सुरिक्षत स्थान देखकर गाड़ी पार्क करके हम लोग पैदल राजभवन के मेनगेट के पास पहुंचे। वहां पर अपना परिचय देने और प्रवेश पत्र दिखाने के बाद मैटल डिटेक्टर से जांच हुई। मोबाइल फोन बंद करने सहित कई हिदायतों के बाद भीतर जाने दिया गया। ( हालांकि यह प्रक्रिया मैं काफी शार्ट कट में निपटा रहा हूं। क्योंकि भीतर जाने लंबी लाईन थी। काफी इंतजार और औपचारिकताओं के बाद हमारा नंबर आ आया। पहले पीआरओ से ओके रिपोर्ट मिलने के बाद सुरक्षा बल के जवान अपने लिस्ट से मिलान कर दूसरे और तीसरे साथी को बता रहे थे।)
खैर, सुरक्षा कक्ष से निकलते और राजभवन में धुसते ही लाल कालीन पर चलकर दरबार हाल में दाखिल हुए। यहीं पर शपथ ग्रहण का कार्यक्रम होना था और आमतौर पर यहीं पर होता है। अपने स्थान पर बैठकर कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार करते रहे। चूंकि राजभवन का कार्यक्रम एकदम तय समय पर शुरू और खत्म होता है और आंगुतकों को आधे घंटे पहले बुलाया जाता है। लिहाजा लोगों ( मेरे) के पास काफी समय था। हर बार की तरह दरबार हाल पर नजरें दौड़ रही थी। एक तो जैसे कि मेरी समझ है यह दरबार हाल का नाम अंग्रेजों के जमाने का है। अंग्रेजी हुकूमत के समय राजा जनता के बीच अपना दरबार लगाते थे। आज के दौर में भी यह नाम सुनते और लिखते समय काफी अटपटा लगता है।
यह नाम सुनकर ही ऐसा लगता है जैसे यहां की दीवारें और चकाचौंध करने वाली एक-एक चीज, लोग अंग्रेज राज की याद दिलाकर चीख-चीख कर गुलामी की दास्तान बता रहे हो। यहां का माहौल भी कुछ इसी तरह का लगता है जैसे कि यहां मौजूद लोग अंग्रेजों के साये में लगान की माफी के लिए राजा से याचिका लगाने आए हों। यहां तैनात पुलिस के अफसरों से लेकर अर्दली तक के कपड़े-लत्ते और हाव-भाव भी कुछ ऐसा ही रहता है। जैसे-तैसे समय कट रहा था, इसी बीच 11 बजते ही शपथ दिलवाने के लिए महामिहम को सामने के बड़े दरवाजे से राजदंड ( भारी भरकम शायद चांदी से बना दंड़, जिसका मतलब क्या है, समझ से परे है।) थामे लोगों तथा आला अधिकारियों ने दरबार हाल में दाखिल करवाया। उनके भीतर घुसते ही सभी ने खड़े होकर अभिवादन किया और पुलिस अफसरों ने टोपी चढ़ाकर चुस्त अंदाज में सलामी ठोंकी। उन्होंने अग्रेजों के जमाने की और उनकी याद दिलाने वाले सिंहासन पर आसान ग्रहण किया। फिरंगी अंदाज में अधिकारियों ने कार्यक्रम शुरू और खत्म करने की इजाजत मांगी। हाल के एक ओर बने बालकनी से राष्ट्रधुन की गूंज से कुछ देर के लिए भारतीय होने का अहसास होता है।
जानकार बताते हैं कि राजदंड और इस दरबार का उपयोग केवल खास मौकों पर कभी-कभार होता है। लेकिन इसकी साजसज्जा किसी राजमहल से कम नहीं है। यहां एक-दो नहीं बल्कि 21 महंगे और भव्य झूमर को देखकर हर बार आंखे चौंधिया जाती है। यह तो इसकी बहुत छोटी सी झलक है। इससे ज्यादा और क्या हो सकता है। मैं इसकी कल्पना करने से कतरा रहा है। हर बार यहां के कार्यक्रमों में शामिल होते समय और इसके बाद मेरे दिमाग में यह ख्याल जरूर आता है कि आखिर यह कौन सा तंत्र है। अगर आपको इसके बारे में कुछ समझ आए तो जरूर बताएं। धन्यवाद

May 04, 2010

बस्तरिया की नई सवारी, सरकार की पुरानी लापरवाही


आज के दौर में मोटरसाइकिल के बारे में कुछ कहा जाए,तो थोड़ा सा भी बोल सकने वाला बच्चा अलग-अलग कंपनियों की बाइक की खूबियों और बुराइयों के बारे में आसानी से बता देगा, लेकिन आपसे कहा जाए कि अबूझमाड ( नारायणपुर जिले का वह गांव, जो आज तक राजस्व रिकार्ड में शामिल नहीं है और जिसका सर्वे तक नहीं हो पाया है) का आदिवासी जिसके पास तन ढ़कने के लिए बमूश्किल गमछा से ज्यादा बड़ा कपड़ा और खाने के लिए दो रोटी से अधिक से कुछ भी नहीं है, वो आज मोटरसाइकिल का मालिक है, तो आपको आशचर्य होगा, लेकिन चौंकने से पहले आपको बता दूं कि बात सौ फीसदी सही हैं। यह बात अलग है कि वो वास्तव में तो वही लगोटधारी आदिवासी है, लेकिन सरकारी रिकार्ड में तो वह बाइक का मालिक है।
बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी का जुगाड़ करने वाला धुर नक्सली जिला दंतेवाड़ा के पामेड गांव का आदिवासी भीमा मंड़ावी इनदिनों इसी बात को लेकर परेशान हैं कि सरकारी रिकार्ड में वो मोटरसाइकिल का मालिक कैसे बन गया। ये केवल भीमा का मामला नहीं है, बल्कि सैकड़ों ऐसे लोग हैं जिनके नाम से थोक में फर्जी तरीके से मोटरसाइकिलें खरीदी गई है। अब आपके दिमाग में चल रहा होगा कि आदिवासी इलाकों में कौन भला मानस या सरकार आ गई जो गरीबों को मोटरसाइकिल खरीदकर दे रही है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक नक्सल इलाकों में नक्सली भोले-भाले और गरीबों के नाम पर मोटरसाइकिल खरीद रहे हैं। इतना ही नहीं, बीहड जंगलों में मोटरसाइकिल से अपने अभियान को बखूबी अंजाम दे रहे हैं।
आपको जानकर आश्चर्य होगा दंतेवाड़ा जिले में लगातार मोटरसाइकिल की बिक्री बढ़ रही है। इलाके के डीलरों का दावा है कि पांच सालों में वहां बिक्री में 40 फीसदी की बढ़ातरी हुई है। यह आंकड़ा हर साल 5-10 फीसदी बढ़ रहा है। एक दोपहिया कंपनी के अधिकारी का कहना है बस्तर में उन्होंने 2009-10 में 6 हजार गाडि़या बेची है। जिसमें से 15 सौ गाडिया दंतेवाड़ा में बिकी है। इसी तरह नारायणपुर में हर महीने 50 से अधिक मोटरसाइकिल की बिक्री हो रही है। .
पुलिस के अफसरों भी इस बात को मान रहे हैं कि उनके पास इस बात के प्रमाण है कि नक्सली आदिवासियों के नाम पर गाड़िया खरीद रहे हैं। डीलरों भी कह रहे हैं है कि वे लोग गाड़ी खरीदने वालों की पहचान की जांच नहीं करते। पुलिस के अफसरों का तो यह भी दावा है कि दंतेवाड़ा के 50 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां पर नक्सली मोटरसाइकिल खरीदने के लिए बेरोजगार आदिवासियों को फायनेंस कर रहे हैं, या उनके लिए फंड इकठ्ठा कर रहे हैं। लेकिन पुलिस की यह जानकारी किस काम की। वो कार्रवाई करने में अपनी लाचारी बता रहे हैं।
जानकारों का तो यह भी कहना है कि वे इन मोटरसाइकिलों का उपयोग अपने अभियान में कर रहे हैं। यही वजह है कि अर्द्ध सैनिक बलों और पुलिस से पहले वे अपने काम को अंजाम देकर आसानी से गायब हो जाते हैं।
आदिवासी इलाकों में एफएमसीजी प्रोडक्ट से लेकर इलेक्ट्रानिक सामानों की बिक्री में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। यहां भले ही बिजली नहीं रहती, लेकिन लोग टीवी और फ्रिज का मजा ले रहे हैं। कुल मिलाकर अब यह बात तो साफ हो गया है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को नंगा-भूखा और पिछड़ा समझने वाले लोगों को अपनी राय बदलनी होगी। क्योंकि वे न तो नंगे-भूखे है और दिन-दुनिया से बेखबर है। दूसरी तरफ नक्सली समस्या से निपटने सरकारों की गंभीरता का बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है।

August 14, 2009

किसकी आजादी और किसका गंणतंत्र



केस-1
छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक अनौपचारिक आदेश में महिला पुलिसकर्मियों के मेहंदी लगाकर 15 अगस्त के परेड में शामिल होने पर रोक लगा दी है।
केस-2
राजधानी रायपुर में एक महिला की बीमारी के बाद मौत हो गई है। उसके 6 और 10 साल के बच्चे अनाथ हो गए हैं।
ये दोनों मामले सुनने तो बहुत सामान्य किस्म के लगते हैं। लेकिन आजादी की 62 वीं वर्षगांठ के ठीक पहले के हैं। लिहाजा दोनों मामले अपने आप में खास हो जाते हैं। हर साल इस दिन आजादी के मायनों पर बहस होती है। सभी की तरह मैं भी इसमें शरीक होता हूं, इतना ही नहीं हम ऐसे कार्यक्रमों और बहस में शामिल होकर गर्व महसूस करते हैं। आजादी लड़ाई में खुद की भागीदारी का अहसास भी करते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, ऐसा करके हम अपने भीतर देशभक्ति के ज़ज्बे का संचार करते हैं। लेकिन इन दोनों मामलों ने मन में खदबदाहट मचा दी है। इस सवाल का जवाब ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर किसकी आजादी और किसका गणतंत्र।

पुलिस के एक अधिकारी से बातचीत के दौरान पता चला कि परेड में शामिल होने वाली महिला कर्मियों को सख्त हिदायत दी गई है कि मेहंदी लगाकर आने पर उन्हें परेड में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके पीछे पुलिस महकमे की सोच का तो कुछ पता नहीं चल पाया, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि इसका कोई तुक नहीं है। ऐसा करना आजादी के बाद भी अंग्रेजी हुकूमत के तानाशाह रवैए को याद दिलाना जैसा है। पुलिस या सेना में काम करने वाले चाहे वो महिला हो या पुरूष, उसके मौलिक अधिकार का हनन तो नहीं होना चाहिए। महिलाओं का श्रृंगार तो उनका आभूषण माना जाता है। वैसे भी मेहंदी रचाना शुभ माना जाता है। ऐसा भी नहीं है कि मेहंदी रचाने से परेड में कोई बाधा उत्पन्न होगी। हर साल की तरह इस बार भी 15 अगस्त के पहले राखी और खमरछठ जैसे बड़े त्यौहार पड़े हैं। जिसमें हर महिला बहुत ज्यादा श्रृंगार न भी करे, तो कम से कम मेहंदी लगाना तो पसंद करती हैं।

दूसरे मामले में एक महिला की अचानक मौत हो गई। उसके दो बच्चे अनाथ हो गए। इस महिला का उसके दो छोटे छोटे बच्चों के अलावा शायद कोई रिश्तेदार नहीं है। हालत ये हैं कि उसके कफन दफन का इंतजाम करने वाला तक कोई नहीं है। मां के मरने के बाद दोनों मासूम बच्चे अपनी मां की अर्थी सजने के इंतजार में पूरी रात शव के सामने बैठे रोते रहे। गनीमत है आस-पड़ोस की कुछ महिलाएं और लोग उसके अंतिम संस्कार के लिए आगे आए और उसके क्रिया कर्म की तैयारी की। उम्मीद है कि जैसे तैसे उस महिला का अंतिम संस्कार तो हो जाएगा, लेकिन उन दो बच्चों के पालन पोषण और भविष्य का संकट अभी भी बना है। कुल मिलाकर, आजादी के 62 साल बाद भी हमारा देश भूखमरी और गरीबी की गुलामी झेल रहा है। ऐसे में ये सवाल तो उठता ही है कि किसकी आजादी और किसका गंणतंत्र।