December 31, 2008

गरीबों से परे का क्या ?



प्रदेश की दोबारा बागडोर संभालने के बाद रमन सरकार ने अपनी घोषणाओं पर अमल करना शुरू कर दिया है। सीएम ने समीक्षा बैठक में गरीबों को राहत देते हुए 1 और 2 रूपए किलो चावल योजना को पहली अप्रैल से लागू करने का एलान कर दिया है। 7 लाख से ज्यादा गरीब परिवारों को 1 रूपए किलो और 29.86 लाख परिवारों को 2 रूपए में चावल मिलेगा। इसी तरह 37 लाख गरीब परिवारों को मुफ्त में नमक मिलेगा। इस फैसले को लेकर एक बार फिर चर्चाएं शुरू हो गई है। सरकार के लोग इसे एतिहासिक फैसला बताते हुए मुख्यमंत्री डा रमन सिंह को गरीबों को हितैषी के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।


इसके पहले चुनावी साल में सीएम ने तीन रूपए किलो चावल योजना चालू किया था। इसके बाद से तो उन्हें चाऊर वाले बाबा की उपाधि मिल गई। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस फैसले से गरीबों को राहत मिल रहा है, लेकिन इससे मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट गड़बड़ा गया है।


दरअसल राज्य सरकार ने हाल में किसानों को धान के समर्थन मूल्य पर 220 रूपए बोनस देने का फैसला लिया है। सरकार अब 11 सौ से साढ़े 11 सौ रूपए प्रति क्विंटल की दर धान खरीदेगी। धान की दर बढ़ने से निश्चित रूप से चावल की कीमतें बढ़ेंगी। इससे रियायती चावल पाने से वंचित लाखों परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। जानकारों का मानना है कि 10-12 रूपए में मिलने वाला चावल भी अब 18-20 रूपए किलो में मिलेगा।


गौर करने लायक ये भी है कि पीडीएस के लिए सस्ता चावल उपलब्ध कराने सरकार से सामने संकट की स्थिति है। इस साल पैदावर भी कम है। ऐसे में संभावना ये भी है कि कालाबाज़ारी के कारण भी खुले बाज़ार में अनाज की कीमतें बढ़ेंगी। मेरा उद्देश्य सरकार की आलोचना करना नहीं है। लेकिन इसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए।

वैसे तीन रूपए किलो चावल योजना के कारण कई परेशानियां सामने आई है। किसानों को खेती किसानी के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। रियायती चावल मिलने से लोगों को रोजगार की चिंता खत्म सी हो गई है। विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसे कई किस्से देखने सुनने मिले। इसके अलावा कई चौंकाने वाली जानकारियां मिली। कई जिलों के कलेक्टरों ने इस बात की पुष्टि की कि चावल योजना के कारण उनके जिलों में शराब की खपत में बेताहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। सरकार ने भी इस बात को जोर शोर से प्रचार किया था कि शराब की बिक्री में छत्तीसगढ़ देश भर में तीसरे नबंर पर आ गया है। शराब के कारण अपराधों में वृद्धि की बात सामने आई है।


मेरा मानना है कि सरकार को सभी वर्गों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी चाहिए, ताकि किसी वर्ग पर इसका प्रभाव न पड़े। गरीबों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार रोजगार उपलब्ध कराने के साथ कुशल श्रमिक बनाने, खेती किसानी की उन्नत तकनीक विकसित करने जैसे कई काम कर सकती है।

August 31, 2008

बिना वेतन का अफ़सर

लाखों-करोड़ों रुपए कमाना हर युवा का सपना होता है। इसके लिए कई दिन रात एक करके कठिन परीक्षा पास करते हैं, तो कुछ करोबार में मेहनत करके पैसा कमाते हैं, लेकिन करोड़ों का पैकेज ठुकराकर आईएएस बने अमित कटारिया का सपना इन सबसे अलग है। वे नौकरी भी बगैर सैलरी के करते हैं।

रायपुर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी और 2004 बैच के आईएएस अमित कटारिया नौकरी केबल पैसों के लिए नहीं करते। यही वजह है कि करीब दो-तीन साल की अपनी नौकरी में दो-तीन बार को छोड़कर वेतन नहीं लिया। दो-तीन बार भी, इसलिए कि ट्रांसफर के बाद नई जगह पर लास्ट पे स्लिप जमा करना अनिवार्य होता है। स्लिप इस बात का प्रूफ माना जाता है कि नई जगह पर पोस्टिंग वाले पुराने स्थान पर काम किया है।

सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा पास करके यहां तक पहुंचे श्री कटारिया का कहना है कि विशेष परिस्थितियों को छोड़कर वे भविष्य में भी वेतन लेना नहीं चाहते। ट्रेनिंग और परवीक्षा अवधि पूरी होने के बाद उनकी पहली पोस्टिग बतौर एसडीएम कवर्धा जिले में हुई थी। यहां कार्यकाल में उन्होंने एकाध बार ही सैलरी लिया। इसके बाद बेमेतरा और कांकेर में जिला पंचायत केञ् सीईओ के रूप में काम किया। बेमेतरा में उन्होंने एक बार भी वेतन नहीं लिया। फिलहाल वे रायपुर जिला पंचायत केञ् सीईओ के रूप में भी बिना तनख्बाह के काम कर रहे हैं। इसके अलावा नौकरी के दौरान सरकारी मकान भी नहीं लिया।

दिल्ली के समीप गुड़गांव के रहने वाले अमित ने इंजीनियरिंग की सर्वोच्च संस्थाओं में से एक आईआईटी दिल्ली इलेकट्रानिक्स में बीटेक किया है। बीटेक की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें देश विदेश की नामी गिरामी कंपनियों से लाखों के पैकेज पर नौकरी का आफर मिला था, लेकिन वे आईएएस बनना चाहते थे। इसलिए सभी आफर ठुकरा दिया।


श्री कटारिया के वेतन नहीं लेने से उनका कई इंक्रीमेंट रूक गया है। उनके बैच मैट्स की सैलेरी 20-25 हजार तक पहुंच गई है, लेकिन उनका वेतन अभी भी 12-15 हजार के बीच बनता है। उनके वेतन का लाखों रुपया सरकारी खजाने में जमा हो गया है। सरकार हर आईएएस अफसर की तनख्बाह उनके बैंक खाते में जमा कर देती है। उन्होंने राज्य शासन को अपना बैंक अकाउंट नंबर ही नहीं दिया है। इसलिए पैसा बैंक में जमा नहीं होता।

उनका कहना है कि वे पिछले वेतन की राशि को क्लेम नहीं करेंगे। श्री कटारिया के परिवार का दिल्ली और आसपास रियल स्टेट का कारोबार है। शापिंग माल और कई कांप्लेक्स भी हैं। परिवार में माता पिता के अलावा दो भाई और दो बहन हैं। माता पिता गुड़गांव में रहते हैं। दोनों बहनें अमेरिका में डाकटर हैं। भाई भी अधिकांश समय इंग्लैंड में रहते हैं। उनकी हाल ही में शादी हुई है। पत्नी एयर इंडि़या में एयर होस्टेज है। उनसे कई गुना ज्यादा पत्नी की आमदनी है।

ये खबर मैने भास्कर मे छापी थी, ब्लाग मे इसलिए पोस्ट कर रहा। मुझे लगता एक उदाहरण सबक लेने लायक है।

August 11, 2008

A Nice Article about Love




I once had a friend who grew to be very close to me.
Once when we were sitting at the edge of a swimming pool, she filled the palm of her hand with some water and held it before me, and said this: "You see this water carefully contained on my hand? It symbolizes Love."



This was how I saw it: As long as you keep your hand caringly open and allow it to remain there, it will always be there. However, if you attempt to close your fingers round it and try to posses it, it will spill through the first cracks it finds.



This is the greatest mistake that people do when they meet love...they try to posses it, they demand, they expect... and just like the water spilling out of your hand, love will retrieve from you .



For love is meant to be free, you cannot change its nature. If there are people you love, allow them to be free beings.
Give and don't expect.Advise, but don't order.Ask, but never demand.
It might sound simple, but it is a lesson that may take a lifetime to truly practice. It is the secret to true love. To truly practice it, you must sincerely feel no expectations from those who you love, and yet an unconditional caring."



Passing thought... Life is not measured by the number of breaths we take; but by the moments that take our breath away.....
Life is beautiful!!! Live it !!!



-by Swami Vivekananda

August 02, 2008

The Wise Songbird



Then the songbird told him it's three great secrets:Never believe all that you hear; Never regret what you have never lost, and never throw away that which you have in your keeping. The gardener was furious when he heard this and said he had known these so-called 'secrets' since he was a little child and shouted that the bird had tricked him. But the songbird quietly replied that if the man had really known these three secrets, or only the last of them, he would never have let him go.


Then the bird added:"I have a most precious jewel weighing over three ounces hidden inside me and whoever possesses that marvellous stone will have every wish granted." On hearing this, the keeper roared like a lion and cursed himself for setting the songster free. But the little bird only added fuel to his rage by explaining that since he weighed no more than half an ounce at most, as anyone with eyes could plainly see, how was it possible that a gem weighing more than three ounces could be hidden within it's tiny body?


At that the man tore his hair and lunged at the bird in a towering rage, but the little songbird flew to a nearby branch and added sweetly:"Since you never had the jewel in your hands you are already regretting what you never lost, and believing what I told you, you threw it away by setting me free." Then the little songbird told the man to study well these three great secrets and so become as wise as the bird himself!

Newton’s laws of LOVE

First law:

A boy in love with a girl continues to be in love with her and a girl in love with a boy continues to be in love with him, until and unless any external agent(brother or father of the girl) comes into play and breaks the legs of the boy.
Second law:
The rate of change of intensity of love of a girl towards a boy is directly proportional to his bank balance.
Third law:
The force applied while proposing a girl by a boy is equal and opposite to the force applied by the girl while using her sandals.

Universal law:
Love can neither be created nor be destroyed, it can only be transfered from one girlfriend to another girlfriend

story of father

An 80 year old man was sitting on the sofa in his house along with his 45 years old highly educated son. Suddenly a crow perched on their window.
The Father asked his Son, "What is this?"
The Son replied "It is a crow".
After a few minutes, the Father asked his Son the 2nd time, "What is this?"
The Son said "Father, I have just now told you "It’s a crow".

After a little while, the old Father again asked his Son the 3rd time,

What is this?"

At this time some expression of irritation was felt in the Son’s tone when he said to his Father with a rebuff. "It’s a crow, a crow".

A little after, the Father again asked his Son t he 4th time, "What is this?"

This time the Son shouted at his Father, "Why do you keep asking me the same question again and again, although I have told you so many times ‘IT IS A CROW’. Are you not able to understand this?"

A little later the Father went to his room and came back with an old tattered diary, which he had maintained since his Son was born. On opening a page, he asked his Son to read that page. When the son read it, the following words were written in the diary :-

"Today my little son aged three was sitting with me on the sofa, when a crow was sitting on the window. My Son asked me 23 times what it was, and I replied to him all 23 times that it was a Crow. I hugged him lovingly each time h e asked me the same question again and again for 23 times. I did not at all feel irritated I rather felt affection for my innocent child".

While the little child asked him 23 times "What is this", the Father had felt no irritation in replying to the same question all 23 times and when today the Father asked his Son the same question just 4 times, the Son felt irritated and annoyed.

So..

If your parents attain old age, do not repulse them or look at them as a burden, but speak to them a gracious word, be cool, obedient, humble and kind to them. Be considerate to your parents.From today say this aloud, "I want to see my parents happy forever. They have cared for me ever since I was a little child. They have always showered their selfless love on me.

They crossed all mountains and valleys without seeing the storm and heat to make me a person presentable in the society today".
Say a prayer to God, "I will serve my old parents in the BEST way. I will say all good and kind words to my dear parents, no matter how they behave.

jokes

1 lerki ne molvi se keha: Log mujhe chedte or ghoorte hain, aap hi bataein mai kya karu..?
Molvi ne dono bazu phailaa k kaha "Aap hamari agosh ma aajaeye"
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Bhikari: saab ek rupiya de do.
Saab: tumhe sharam nahi aati road par khade hokar bhikh mangte?
Bhikari: abe tere ek rupiye ke liye office kholu kya?
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Ye pyar bhi ajib cheez hoti hai.
Maa se ho to - MAMTA.
Baap se ho to - KARTAVYA.
Bhai se ho to - DHARM.
Behn se ho to - FARZ.
Aur Biwi se ho to
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Sonu
Monu
Chhotu
Pappu...
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Girlfriend: And are you sure you love me and no one else?
Boyfriend: Dead Sure! I checked the whole list again yesterday


Waiter: Would you like your coffee black?
Customer: What other colors do you have?


Manager: Sorry, but i can’t give u a job. I don’t need much help.
Job Applicant: That’s all right. In fact I’m just the right person in this case. You see, I won’t be of much help anyway!!


Dad: Son, what do u want for ur birthday?
Son: Not much dad, Just a radio with a sports car around it.



Husband: U know, wife, our son got his brain from me.
Wife: I think he did, I’ve still got mine with me!


Man: Officer! There’s a bomb in my garden!
Officer: Don’t worry. If no one claims it within three days, you can keep it.


Father: Your teacher says she finds it impossible to teach you anything!
Son: That’s why I say she’s no good!

June 07, 2008

आला रे आला सूरज आला...


महंगाई को लेकर पूरे देश में जमकर हल्ला मचा हुआ है। मंत्रालय से लेकर चौक चौराहे पर चर्चा का विषय महंगाई है। महिलाएं किचन में महंगाई का रोना रो रही हैं, तो पुरूषो को पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें भारी पड़ रही है। सत्तारूञ्ढ दल के पास अपनी दलील है, तो विपक्ष काला-पीला दिवस मना रहा है। टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया भी महंगाई पर हर किसी के किचन में घुस कर इसका बखान कर रहे हैं। अखबार से जुड़े होने के कारण हम लोगों ने भी इस विशेष पर जोर लगाया। इसमें कोई संदेह नहीं कि समस्या बड़ी है, लेकिन मेरा मानना है कि हल्ला मचाने के बजाए समस्या का हल निकालने एनर्जी लगानी चाहिए। महंगाई पर आम लोगों, जानकार और अलग-अलग फील्ड के एक्सपर्ट से बात करने पर मुझे लगा कि कुछ विकल्प हैं जिससे बहुत ज्यादा तो नहीं,लेकिन कुछ हद तक महंगाई की समस्या से निपटा जा सकता है।
सोलर एनर्जी के बारे में हम सभी जानते हैं। कुछ लोग इसका उपयोग भी करते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि छत्तीसगढ़ में सूर्य की गरमी से पावर जनरेट करने की अच्छी संभावना है। दूसरे राज्यों की तुलना में यहां सूर्य का ताप करीब 35 प्रतिशत ज्यादा है। बारिश को छोड़कर 10 महीने 8-10 घण्टे सूर्य निकलता है। इससे बिजली पैदा करना तो आसान हो गया है। राजस्थान सरकार विदेशी कंपनियों की मदद से 5 मेगावाट का सोलर पावर प्लांट लगाने जा रही है। यह सबसे बड़ा पावर प्लांट होगा। यूएस और आस्ट्रेलिया जैसे देश भी सोलर पावर को और विकसित करने में जुटे हैं। गूगल का पूरा नेटवर्क सोलर पावर से चलता है। तभी तो हम सब कभी भी गूगल सर्च कर मनचाही जानकारी पाते हैं, और रूकावट के लिए खेद है जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।
इस पर अभी शोध बाकी है, लेकिन घर की छतों पर सोलर प्लेट्स लगाकर किचन में खाना बनाने की व्यवस्था हो सकती है। इसी तरह बायोडीजल और बैटरी वाली गाडि़यां पेट्रोल डीजल का बेहतर विकल्प हो सकती है। बायोडीजल का महत्व तो बड़ी बड़ी पेट्रोलियम कंपनियां भी समझने लगी हैं, लेकिन यही पेट्रोलियम लाबी इसे बढ़ावा देने के खिलाफ है। उनका मानना है कि यह बेहतर विकल्प नहीं हो सकता। इसके बावजूद डी-वन जैसी विदेशी कंपनियां छत्तीसगढ़ से जेट्रोफा के बीज को आउट करने 50 किलो की दर पर खरीद कर रहे हैं। जबकि सरकार ने इसका समर्थन मूल्य साढ़े 6 रुपया तय किया है। सबसे अहम बात यह होगी कि गैर परम्परागत ईंधन के उपयोग से देश को दूसरों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। देश का पैसा देश में ही रहेगा। हजारों करोड़ की सबसिडी देना सरकार के लिए जरूरी नहीं होगा। यह पैसा देश के विकास पर खर्च होगा। विश्व के दूसरे देश सोलर पावर का महत्व समझकर इसे अपना रहे हैं। तो हमें भी गंभीरता से इस पर सोचना चाहिए।


March 21, 2008

चीन का हमला...

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कोई नई बात नहीं है। जमीन को लेकर चीन ने भारत पर हमला भी किया। विवाद अभी भी सुलझा नहीं है। देश का एक बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में है। राजीव गांधी के समय दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की काफी कोशिश की। राजीव गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे खूब लगे। काफी समय से दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर राजनीतिक और सैन्य स्तर पर खुलकर कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि चीनी आक्रमण का खतरा टल गया है,लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि चीनी खतरा टला नहीं,बल्कि तेज हो गया है। हमला सीमा पर नहीं,घर-घर में हो रहा है।

पूरी प्लानिंग से चाइनीज घर-घर पहुंच रहे हैं। देश के प्रमुख त्योहारों से लेकर रुटीन में चीनी छाए हुए हैं। अगर अपने आसपास नजर दौड़ाया जाए तो आप भी इसे महसूस करेंगे कि ये आखिर हो क्या रहा है। होली का बाजार भी चाइनीज सामानों से भरा पड़ा है। बच्चों की पिचकारी से लेकर तरह-तरह के हर्बल रंग भी चीन से आए हैं। सस्ते होने के कारण गरीबों को लुभा भी रहे हैं। इसी तरह इलेकट्रानिक सामानों तथा बच्चों के खिलौनों से मार्केट पटा हुआ है।

हजार रुपए में मोबाइल युवाओं को इस कदर पसंद आ रहे हैं कि कालेज स्टूडेंट्स रोज नए-नए मोबाइल ले रहे हैं। लगभग हर घर चाइनीज सामानों से भरा पड़ा है। जिसका कोई उपयोग नहीं है। ये आइटम केबल घरों में कबाड़ पैदा कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि बाजार का 50 प्रतिशत हिस्सा चीन के कब्जे में है। ऐसे में इसे एक और चीनी आक्रमण कहना गलत नहीं लगता।


केवल आलोचना करने के लिए इन सामानों का विरोध नहीं कर रहा हूं। इनका उपयोग करने वाले खुद सोचें कि कुछ पैसे बचाने वे सस्ता सामान खरीद तो लेते है,लेकिन घर पहुंचने के बाद पता चलता है कि उनके हाथ खराब या कबाड़ लगा है। बहुत सारे लोग जानने के बाद बिना गारंटी वाले इन सामानों को खरीद रहे हैं। आखिर में सभी को होली की शुभकामना।

February 25, 2008

कहां से कहां ... तक

एक-दो रोज से काफी फ़ुर्सत में हूं। इसके बावजूद लिखने -पढ़ने जैसा कुछ नहीं हो रहा है। एकदम खाली होना भी निरस हो जाता है। दरअसल एक नौकरी छोड़कर दूसरी ज्वाईन करने की तैयारी है। इस वजह से भी दिमाग में तरह-तरह की उलझनें है और कुछ दूसरी परेशानी भी है।

खैर एक दो दिन की बात है,सोचकर मन को तसल्ली दे रहा हूं। अधिकांश समय घर में रहना हो रहा है। लगता था कि घर में आराम ही आराम होगा लेकिन यहां तो एक कप चाय के लिए भी जूझना पड़ता है। मुंह से चाय का नाम सुनकर बीवी की आंखे लाल हो जाती है और दिनभर के चाय का बही खाता खुल जाता है। रोज अलग-अलग बहाने और तानों से चाय मिल जाए तो लगता है कि जंग जीत गया। चाय के लिए कई बार किसी के आने का इंतजार भी करना पड़ता है। कई दफ़े तो फोन कर किसी को बुलाने का जोखिम भी लेता हूं। खैर सभी शादीशुदा लोगों को घर में इस तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता होगा। मेरे जैसे लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं है।

बीते रविवार को मैंने एक कप चाय के लिए बैठे-बिठाए एक नई मुसीबत मोल ले ली। बीवी ने चाय के बदले जगार घूमाने की शर्त रख दी। तलब थी तो आगे-पीछे का सोचे बिना सर हिला दिया। चाय खत्म होने के बाद लगा कि कंगाली में आटा गिला होने वाला है। एक तो बेरोजगार और अखबार की नौकरी में एक माह की पगार नहीं मिली सो अलग।

मर्द की जुबान का दंभ भरते हुए मेला जाने तैयार हुआ,लेकिन वहां बीवी ने तो कुछ खास परेशानी में नहीं डाला अलबत्ता मेले के माहौल से जरूर प्राब्लम हुई। स्कूल-कालेज में पढ़ने वाली लड़कियों और उनकी अम्माओं का कहर देखकर मेले से जी भर गया। मेले-ठेले में भ्रमण का शौक ज्यादा नहीं है। गए भी तो किसी स्टाल में चाय और दोस्तों के साथ देश-विदेश की चर्चा से मेला घूमना हो जाता था। इस बार बीवी के साथ गया था,तो दोस्ती-यारी केवल हाय-हैलो तक ही रही। मेला घूमने के लिहाज से इधर-उधर नजर दौड़या ,तो लगा कि अनजाने देश के किसी माल या फिर किसी फ़ैशन शो तो नहीं पहुंच गया।

एक जगह और एक साथ लडकियों की नीची खिसकती जींस और ऊपर चढ़ती टी-शर्ट देखकर अजीब सा लगने लगा। इतना ही नहीं महिलाओं के महीन सलवार कुर्ता और साड़ी के बीच झांकते भीतरी कपड़ों का नजारा भी समझ नहीं आया। पहले मुझे लगा कि यह फ़ैशन का नया चलन होगा,लेकिन बात हजम नहीं हो रही थी। क्योकि इसमें फ़ैशन कम शरीर ज्यादा दिख रहा था। हो सकता है कि मेरी बातें कईयों को पुरानी या दकियानूसी लगे। मैं फ़ैशन को कोसना भी नहीं चाहता,लेकिन सोचने समझने को उस समय विवश हुआ जब उन कुछ मनचलों पर नजर पड़ी जो मेला नहीं बल्कि लड़कियों और महिलाओं को ही घूर रहे थे। कई तरह के कमेंट भी सुनने मिले। ऐसी ज्यादातर लड़कियों तथा महिलाओं के साथ उनका पूरा परिवार भी था। ऐसे में अटपटा नहीं लगना अस्वाभाविक सा ही है। मुझे लगता है कि इस गंभीर विषय पर हम सभी को विचार करने की जरूरत है। जब तेजी से गांव से लेकर शहरी,मेट्रो संस्कृति और सभ्य समाज में छेड़खानी-बलात्कार,शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं।

February 21, 2008

छत्तीसगढ़ भी कत्लेआम के लिए तैयार...

छत्तीसगढ़ भी अब कत्लेआम के लिए तैयार है। यहां भी रोजाना सैकड़ों-हजारों की खून की होली खेली जाएगी और कईयों के सिर धड़ से अलग होंगे। ऐसा कोई और नही,बल्कि छत्तीसगढ़ की सरकार करने जा रही है। राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़(रायपुर,बिलासपुर,भिलाई) में कत्लखाना खोलने केन्द्र को प्रस्ताव भेजा है। मंजूरी के बाद यहां भी बेगुनाह जानवरों की हत्या की जाएगी।

पशुओं की हत्या के खिलाफ अब कोई हल्ला नहीं मचा सकेगा। ऐसा करने के लिए राज्य शासन ने पूरी तैयारी कर ली है। अब तो केवल केन्द्र सरकार के एक इशारे का इंतजार है। अपने आप को हिंदूवादी संगठन कहने वाली भाजपा शायद भूल गई है कि हिन्दू धर्म में जीव हत्या को सबसे बड़ा पाप माना जाता है। धर्म में गौ(गाय)को माता का दर्जा दिया गया है। पता नहीं किस धर्म और संस्कृति के तहत बेजुबानों की हत्या के लिए कत्लखाना खोलने की तैयारी है।

गौ और अन्य पशुओं की हत्या का विरोध करने वाले हिन्दूवादी संगठन अब खुद उसी रास्ते में चलने के लिए कदम बढ़ा रहे हैं। लगता है कि प्रदेश में सरकार ने शायद कत्लखाने के बारे में ही सोचकर आदिवासियों को गाय बांटने की योजना शुरू की थी।इतना ही नहीं कत्लखाने के लिए जमीन तलाश ली गई है और करोड़ों का बजट भी स्वीकृत कर दिया गया है। करोड़ों की अत्याधुनिक मशीनें स्थापित किए जाएंगे,ताकि पशुओं को मशीनों से काटा जा सके। यहां से देश-विदेश के गोश्त प्रेमियों को ताजा व ठंड़ा मांस परोसा जाएगा। सरकार की दलील है कि कत्लखाना खुलने से खुलेआम पशुओं की कटाई पर रोक लगेगी। वाकई इस तर्क का तो कोई काट नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों की खुलेआम हत्या और बिक्री के लिए कानून बनाया है। लेकिन इसकी याद तो सरकारों को गांधीजी की जयंती और पुण्यतिथि को ही आती है। जोगी शासनकाल में भी कत्लखाना खोलने का प्रस्ताव बनाया गया था,लेकिन पशुप्रेमियों के विराध के कारण इसे टाल दिया गया था। नए प्रस्ताव पर अभी तक किसी ने सुध नहीं ली है।

February 20, 2008

ढाई हजार से परे लाखों का क्या ?

छत्तीसगढ़ में तेजी से औघोगिकरण-शहरीकरण हो रहा है। एक बार में सोचने पर लगता है कि प्रदेश का विकास हो रहा है,लेकिन एक जानकार अधिकारी के साथ अनौपचारिक चर्चा में कई खतरनाक जानकारियां भी सामने आई। उघोगों की बढ़ती संख्या के कारण पर्यावरणीय दुष्परिणाम के बारे में सभी जानते हैं। शहर के हर घर की छत उघोगों की काली धूल से पटी है। दूसरी तरफ इससे होने वाले मानवीय दुष्परिणामों के आकड़ों पर नजर डालें,तो आश्चर्य होगा कि रायपुर की दस-बारह लाख की आबादी में करीब एक लाख से अधिक लोग कैंसर,अस्थमा,फ़ेफ़ड़ों की बीमारी,त्वचा रोग से पीडि़त हैं। इसमें अधिकांश कम उम्र के लोग हैं। यह आंकड़े केवल सरकारी अस्तपाल मेकाहारा के हैं,जहां गरीब,मध्यम वर्ग के लोग इलाज कराते हैं। निजी अस्पतालों और बाम्बे जाकर कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज कराने वाले लोगों को भी इसमें शामिल किया जाए तो आंकड़े दोगुने हो सकते हैं।

जानकारों का मानना है कि ये बीमारियां उन कुछ उघोगपतियों की ही देन है,जो खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे है और लाखों के जीवन से खिलवाड कर रहे हैं।उघोगों के प्रदूषण के बारे तमाम लोग यह भी जानते हैं कि इसने ओजोन परत तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। खुलेआम काला धुआं छोड़ते उघोगों पर सरकार प्रशासन के लोग उन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। दैनिक छत्तीसगढ़ के संपादक सुनील कुमार ने पिछले दिनों विशेष संपादकीय में लिखा है कि सरकारी विज्ञापनों में भी राजधानी के प्रदूषण को किस तरह स्वीकार किया जा रहा है।

गृह निर्माण मण्डल ने नई राजधानी में शुरू की योजना का इश्तहार कुछ इस तरह जारी किया-नीरसता को तिलांजलि,प्रदूषण और अशांति भूले भी नहीं भटकेंगी इसकी गलियों में........अंग्रेजी में कुछ इस तरह लिखा गया है कि पाल्यूशन एंड नाएस लेफ़ट बिहाइंड वेयर दे बिलांग। मतलब साफ है कि इस बस्ती में बसने वालों प्रदूषण और शोर को वहीं छोड़ कर आओ जहां उनको रहना चाहिए। यहां पर हाउसिंग बोर्ड ढाई से पचास लाख तक दाम वाले ढाई हजार मकान बना रहा है। लेकिन इन ढाई हजार मकानों में रहने वाले लोगों से परे उन लाखों लोगों का क्या होगा। जाहिर है उनके हिस्से में वही कारखानों की काली धूल ही रहेगी।

February 14, 2008

समस्या से बड़ी है दुकानदारी...

छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा जगजाहिर है। दुनिया में सबसे अलग बस्तर की स्थिति संभवत काफी पीड़ादायक है लेकिन इस मुद्दे पर सरकार,विपक्ष,पत्रकारों,एनजीओ,मानवाधिकार संगठनों सभी की अपनी दुकानदारी है। तमाम लोग समस्या को सुलझाने के बजाए उलझाने में लगे हैं। यह मेरा व्यक्तिगत तौर पर कोई निकाला निष्कर्ष नहीं बल्कि समय-समय पर इसके प्रमाण मिले हैं।

वास्तव में कोई समस्या का निपटारा नहीं चाहता,जाहिर सी बात है कि नक्सलवाद चरम स्थिति पर पहुंच गया है। आम नागरिक की हैसियत से छत्तीसगढि़या के मन में यह सवाल आता ही होगा कि राज्य में कब एक जैसा (बस्तर और दूसरी जगह मे)कानून आएगा और कब आदिवासियों,जवानों-नक्सलियों के बीच संघर्ष खत्म होगा। लगातार खूनखराबे में बढ़ोत्तरी हो रही है और लोगों में दहशत का वातावरण बनते जा रहा है। बस्तर से राजधानी तक हिंसा के सामानों का अदान-प्रदान दिखाई देने लगा है,हालांकि नक्सलियों के सिटी नेटवर्क को ध्वस्त करने में पुलिस को काफी सफलता मिली है। दूसरी तरफ इसे खतरनाक संकेत मानने के पर्याप्त आधार हैं।

पुलिस ने हाल-फिलहाल में नक्सलियों के मदद से मामले में स्वतंत्र पत्रकार प्रफ़ुल्ल झा,सामाजिक कायकर्ता बिनायक सेन समेत अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया है। इनसे पूछताछ में पत्रकारों को माहवारी पैसा मिलने की जानकारी तो मिली है। डीजीपी ने अपने कई इंटरव्यू में एनजीओ-मानवाधिकार संगठनों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। आदिवासी और नक्सल क्षेत्रों में काम करने के लिए संगठनों को सरकारी और विदेशी पैसा भरपूर मिल रहा है। जानकार आश्चर्य होता है कि राज्य बनने केञ् बाद यहां एनजीओ की सख्या भी पचास हजार को पार कर चुकी है। इसमें खास बात यह भी सामने आई है कि अधिकांश संस्था नेता-मंत्री और अफसरों की है। ऐसे में संस्थाओं पर सवाल का मतलब भी जाहिर है।

भले ही बहुत सारे आम आदमी की तरह मै भी नक्सलियों की आडियोलाजी और सरकार,विपक्ष,संगठनों की गैरकानूनी हिंसा के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान-कार्यक्रम से वाकिफ हूं या न नहीं। यह अलग बात है लेकिन असल सवाल यह उठता है कि अपनी दुकानदारी के लिए आदिवासियों-जवानों केञ् मौत के सौदागरों से कैसे निपटा जाए। प्रभावित लोग सरकार,संगठन,नेताओं का साथ देकर फ़स रहे हैं। ऐसे लोग अलग-थलग तो पड़े हैं,साथ ही इस असमंजस भी हैं कि आखिर किसका साथ दिया जाए।


सरकार और नेता आंकड़ों में उलझे हैं कि इस साल वारदातें बढ़ी-घटी है पर असल सवाल तो यह है कि घटनाएं हो रही है। सरकार की दलील है कि आजादी के लिए तो कुर्बार्नी देनी ही पड़ती है। मुझे लगता है कि यह बिना मतलब का तर्क है। समस्या पर तमाम लोगों को एकजुट और गंभीर होना पड़ेगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सैकड़ों गांव खाली हो गए हैं। पचास हजार परिवार कैम्पो में रहकर सालों से निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। शिविरों में महिलाओं-बच्चों के इलाज,पढ़ाई,खाने-पीने की व्यवस्था का अभाव है। अव्यवस्थाओं के बीच सरकार का करोड़ों रूञ्पया व्यर्थ में खर्च भी हो रहा है।

February 13, 2008

हे राम इन्हें माफ कर देना

13फ़रवरी यानि वेलेंटाइन डे के एक दिन पहले मेरे करीबी और वरिष्ठ शैलेन्द्र खंडेलवालजी का फोन आया। वे भिलाई में ग्रीटिंग और गिफ़ट आइटम की शाप चलाते है। फोन पर काफी घबराहट में उन्होंने बताया कि उनके दुकानों में युवकों ने तोड़फोड़ और मारपीट की। भिलाई में उनकी इस तरह की दो दुकानें है। पहले एक दुकान में हमला बोलने के बाद हुड़दगियों की टोली दूसरे दुकान पर पहुंची। उन्हें इसकी आशंका थी,इसलिए पुलिस को सूचना देकर अपने दूसरे दुकान में पहुंचे,जहां पहले से उनके भाई और बहू मौजूद थे।

हुड़दगी वहां पहुंचकर उत्पात करते इससे पहले उन्हें समझाने की कोशिश की गई और बताया कि ऐसा कोई भी सामान दुकान में नहीं है जिससे किसी की संस्कृति,सभ्यता को ठेस पहुंचे। इसके बाद भी वे लोग नहीं मानें और दुकान की तलाशी लेने घुस गये,हालांकि उन्हें कोई ऐसा आइटम नहीं मिला जिसके बहाने वे हंगामा खड़ा करते। जाहिर सी बात कि धर्म के ठेकेदार इन लोगो को कुछ तो करना था,क्योकि वे वेलेंटाईन डे का विरोध करने जो निकले थे। कुछ आपत्तिजनक सामान नहीं मिलने से वे बहस पर उतारू हो गए। इस बीच वहां मौजूद बाकी लोगों ने तोड़-फोड़ शुरू कर दी। इससे भी मन नहीं भरा तो वे मारपीट और लूटपाट भी शुरू कर दिया। इस तरह शैलेंन्द्रजी को चोटें आई और दुकान तहस-नहस अलग से हो गया। उन्होंने पुलिस को पहले ही सूचित कर दिया था। इसका उन्हें कोई फायदा नहीं मिला जब तक पुलिस पहुंची खेल खत्म हो चुका था,इतना ही नही तब तक समाज के इन ठेकेदारों ने वहां के दर्जनों दुकानों का भी वही हाल किया। सारे लोग घातक हथियार तलवार,चाकू सहित लाठी-हाकी से लैस थे। मार और नुकसान खाकर इन दुकानदारों को डाकटरी परीक्षण-शिकायत के लिए घंटों भटकना पड़ा।
मैं पूरे घटनाक्रम की जानकारी इसलिए भी दे रहा हूं कि मेरे पास इसके अलावा कुछ बताने-कहने के लिए नहीं है। यह कोई नई बात भी नहीं है। इस तरह की घटनाएं अमूमन हर साल हर शहर में होती है। शैलेन्द्रजी ने मुझे बताया कि इस तरह की घटनाओं की आशंका के कारण वे कई सालों से 14 फरवरी को दुकान खोलते ही नहीं। लेकिन इस बार एक दिन पहले ही सबकुछ हो गया।
यीशू,गांधी,विवेकानंद और गौतम बुद्ध के इस देश में संस्कृति तो खत्म हो गई तभी तो इजहारे मुहब्बत का सामन बेचने और ऐसा करने वालों के साथ इस तरह की बदसलूकी होती है। मैं वेलेंटाईन डे का समर्थक या विरोधी नहीं हूं,लेकिन इतना जरूर जानना चाहता हूं कि भगवान और धर्म की ठेकेदारी करने वाले इन लोगों को खुलेआम मारपीट-लूटपाट करने का लाइसेंस किस संस्कृति अथवा सभ्यता ने दे दिया। हमारे देश की संस्कृति-सभ्यता में हिंसा का तो स्थान नहीं है। गांधीजी ने भी देश को आजाद कराने हथियारों का सहारा नहीं लिया था,फिर ये लोग किस सभ्यता-संस्कृति की बात कर रहे हैं। विरोध-प्रदर्शन के भी अपने तरीके हैं,शायद इनके लिए नहीं हैं।पुलिस और प्रशासन भी हर साल की इस नौटंकी से वाकिफ है फिर भी वे किस इंतजार में बैठे रहते हैं,पता नहीं। इन हुड़दगियों,समाज सुधारकों की हिम्मत तो देखिए कि वे बकायदा प्रेस नोट भेजकर लोगों को धमकाते भी हैं। जनता हर बार इस भ्रम में रहती है कि पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगी या फिर उनके कुछ करने से पहले मुंह काला कर शहर में घूमाएगी,लेकिन पुलिस-कानून तो दादागिरी-गुण्डागिरी करने वालों के लिए नहीं,बल्कि आम लोगों के लिए है। पुलिस बेचारी भी क्या करे,क्योकि सबकुछ एक दिन पहले जो हो गया। आखिर में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि हे भगवान इन्हें माफ कर देना,ये समझदार नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं।

February 10, 2008

अब तो बस करो सरकार

अपने स्कूल के दिनों के साथी संजीत की मदद से आखिरकार मैंने भी ब्लाग बना ही लिया। करीब दो घंटों की सीटिंग के बाद यह तैयार हुआ। ब्लाग का नाम और तमाम जानकारियां संजीत ने ही सुझाया। इसमें थोड़ा काम और बाकी हैं। उसके लिए एक और बैठक दोनों करेंगे। संजीत ने कहा कि तुम्हे लिखना तो शुरू कर देना चाहिए। मैंने भी उससे सहमत होकर की-बोर्ड पर हाथ चलाने का काम शुरू कर दिया है। मैं संजीत के अवारा बंजारा को देखकर काफी दिनों से ब्लाग बनाने के बारे में प्लान कर रहा था। इसके जरिए मैं अपने छत्तीसगढि़या भाईयों-बहनों के साथ जुड़कर प्रदेश की सामाजिक और जनहित के मुद्दों पर चर्चा करना चाहता हूं। पिछलों कई सालों से अखबार व न्यूज चैनल में काम करते हुए भी यही कोशिश करता रहा हूं। अब ब्लाग में इन मुद्दों पर खुली चर्चा और बहस होगी।

पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ में रमन सरकार की 3 रूपए किलो चावल योजना का जोरदार हल्ला है। 34 लाख गरीब परिवारों को सस्ता अनाज देकर जाहिर सी बात है कि सरकार इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई है। इसकी झलक केशकाल के उपचुनाव में देखने को मिली,जहां भाजपा ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल कर इसे भुनाया। सरकारी योजनाओं की आलोचना करने के पक्ष में तब तक नहीं रहता हूं,जब तक उससे किसी एक आदमी का भी अहित न होता हो,फिर तो इससे लाखो परिवारों को काफी कम कीमत में दो वक्त का भरपेट भोजन मिल रहा है। मैं कहता हूं कि योजना में भ्रष्टाचार के लिए भले लाख उपाय किए जा रहे हो। भारी मात्रा में फर्जी राशन कार्ड बने हो या फिर गरीबों का राशन की कालाबाजारी की जा रही हो। इसके बावजूद भी लाखों का भला होगा। असल मुद्दा यह नहीं है कि इसमें भ्रष्टाचार हो रहा है। मैं सरकार और उससे जुड़े लोगो,आम जनता से सवाल करना चाहता हूं कि क्या इस योजना से उन सभी गरीबों का वास्तव में भला होने वाला है? दरअसल मूल प्रश्न यह उठता है कि इससे प्रदेश की आर्थिक-सामाजिक,खेती-किसानी और रोजगार की स्थिति पर कितना असर पड़ेगा।

धान का कटोरा कहे जाने वाले इस राज्य में पहले ही पैदावार घट रही है। इस योजना से क्या किसान-मजदूर खेत में जाना पसंद करेंगे? अगर नहीं तो निश्चित रूप से आने वाले समय में धान की फसल में बेताहाशा गिरावट आएगी। हम इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराएंगे? शांतिप्रिय छत्तीसगढि़या की मंशा कभी भी जरूरत से ज्यादा कमाने की नहीं रही है। इसका असर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा और गरीबों के जीवन पर भी। कुछ जानकारों की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि सस्ता(मुफ़्त)अनाज देने के बजाए सरकार को ज्यादा से ज्यादा पैदावार के लिए योजना शुरू करनी चाहिए। ऐसा करने से आम और गरीब किसान-मजदूर वयक्ति सपन्न होगा अन्यथा गरीबी के आंकड़े में वृध्दि आश्चर्यजनक नहीं होगी।

सरकार इस योजना पर 837 करोड़ रूपए खर्च कर रही है। इतनी बड़ी रकम में किसानों और उनके परिवार का दूसरे ढ़ंग से भला हो सकता है। मसलन सरकार प्रदेश के लाखों गरीब-पढ़े लिखे बेराजगारों को राहत दे सकती जिनसे इन दिनों भर्ती परीक्षा के नाम पर सैकड़ों-हजारों रूपए वसूले जा रहे हैं। इसी तरह शिक्षक और सुविधाविहीन स्कूल-कालेजों में राशि खर्च की जा सकती है। शिक्षा-दीक्षा में पैसा खर्च कर प्रदेश और लोगों का भी भला होगा। जैसा कि पता चलता है कि बस्तर जैसे इलाकों में शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। गरीब आदिवासी जागरूकता व शिक्षा के अभाव में चंद लोगों के शोषण का शिकार हो रहे हैं।कई अखबारों के सम्पादकीय पन्नों में इस योजना के तारीफ में इस कदर कसीदे लिखे गए कि विरोध करने वाले लोगों के मुंह में ताले पड़ गए। क्या करें बेचारे राजनीति करने वालों को भी अपने वोट बैंक की चिंता है। दांव उल्टा पड़ गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। मजबूरी में कांग्रेस को दो रूपए किलो चावल की घोषणा करनी पड़ी।

मैं तो कहता हूं कि इस मसले पर गंभीरता से विचार करते हुए सामाजिक संगठनों और प्रबुध्द वर्ग को सामने आना चाहिए। समाचार पत्रों और मीडिया को इस ओर ध्यान दिलाने काम करना चाहिए। मीडिया और ज्यादातर नेता इसमें भ्रष्टाचार-गड़बड़ी को सुर्खिया बनाने तथा लोकप्रियता हासिल करने चुप बैठा है,जबकि इस तरह के मुद्दे बहुत मिलेंगे। यह वक्त गरीबों को प्रलोभनों से वाकिफ कराने और उससे बचाने का है।आदिवासी राज्य होने के कारण इसकी पहचान भी एक भूखे-नंगे प्रदेश के रूप में है। प्रदेश से बाहर के ज्यादातर गैर पत्रकार मित्र आज भी मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में आदिम जमाने के लोग रहते हैं। दूसरी तरफ राज्य की खनिज संपदा और जंगलों पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गिद्द नजर है। अफसोस तो तब होता है जब लोग छत्तीसगढ़ को बिकाऊ समझते हैं। कुछ दिनों पहले इंटरनेट में एक विदेशी पत्रकार की स्टोरी पढ़ने मिली। जिसकी हेडलाइन छत्तीसगढ़ फार सोल्ड ही कचोटने वाली है। उन्होंने लिखा था कि अगर आपके पास पैसा है,तो छत्तीसगढ़ बिकने के लिए तैयार है,आप चाहे तो वहां की नदियां,पहाड,जंगल,जमीन,खदान,हवा सब कुछ खरीद सकते हैं।मामला चाहे शिवनाथ नदी के पानी बेचने का हो या फिर देवभोग के हीरा अथवा बैलाडिला के बहुमूल्य लौह अयस्क की बिक्री का हो। पूरी सरकार और अधिकारी कटघरे में नजर आते हैं। ऐसे सरकारी तंत्र को चावल बांटने से ज्यादा दिलचस्पी राज्य की दशा-दिशा और सही पहचान बनाने में दिखानी चाहिए।